तपन सिन्हा

तपन सिन्हा जन्म 02oct,मृत्यु15jan 
तपन सिन्हा
सिनेमा एवं हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध निर्देशक थे। इन्हें 2006 का दादा साहेब फाल्के पुरस्कार भी मिला था। तपन सिन्हा की फिल्में भारत के अलावा बर्लिन, वेनिस, लंदन, मास्को जैसे अंतरराष्ट्रीय ‍फिल्म समारोहों में भी सराही गई थीं। इन्होंने भौतिकी विषय में स्नातकोत्तर किया था।
🎂जन्म: 02 अक्तूबर 1924, कोलकाता
⚰️ मृत्यु: 15 जनवरी 2009, कोलकाता
बच्चे: अनिनद्या सिन्हा
पत्नी: अरुन्धती देवी (विवा. 1957–1990)
किताबें: Mane paṛe
इनाम: राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म इन बंगाली,
सिन्हा का जन्म कोलकाता , पश्चिम बंगाल में हुआ था । फिल्मों के प्रति उनकी सहानुभूति छात्र जीवन से ही शुरू हो गई थी। उनका दाखिला पांचवी कक्षा में भागलपुर के दुर्गाचरण एमई स्कूल में कराया गया । बाद में यह एक माध्यमिक विद्यालय बन गया। उनके प्रधानाचार्य सुरेंद्रनाथ गंगोपाध्याय थे जो शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के मामा थे। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय में भौतिकी का अध्ययन किया और बाद में कलकत्ता विश्वविद्यालय के राजाबाजार साइंस कॉलेज से एमएससी की उपाधि प्राप्त की ।
इन्होंने भौतिकी विषय में स्नातकोत्तर किया था। ये सबसे अधिक गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के कार्यो से प्रभावित थे। तपन सिन्हा ने बांग्ला फ़िल्म अभिनेत्री अरुंधती देवी से विवाह किया था। इनके पुत्र अनिन्द्य सिन्हा भारतीय वैज्ञानिक हैं। तपन जी अपने जीवन की संध्या में हृदय रोग से पीड़ित हो गये थे और अन्ततः  15जनवरी, 2009को परलोक सिधार गये।इनकी पत्नी की मृत्यु 1990 में ही हो चुकी थी। सगीना महतो और सफेद हाथी जैसी उल्लेखनीय फिल्में बनाने वाले सिन्हा विभिन्न श्रेणियों में अभी तक 19 राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किए जा चुके हैं। स्वतंत्रता की 60वीं जयंती पर भारत सरकार ने उन्हें फिल्म जगत में अद्वितीय योगदान के लिए अवार्ड फॉर लाइफ टाइम अचीवमेंट से सम्मानित किय़ा था।तपन जी की पहली फिल्म उपहार थी जो 1955में रिलीज़ हुई थी। 1956मे रिलीज़ हुई फिल्म काबुलीवाला दूसरी फिल्म थी। इसके अलावा एक डॉक्टर की मौत, सगीना और आदमी और औरत इनकी बेहतरीन फिल्मों में गिनी जाती हैँ। इन्होंने बावर्ची जैसी कई फिल्मों की कहानी भी लिखी है।
उन्होंने भारतीय अभिनेत्री अरुंधति देवी से शादी की । उनके बेटे भारतीय वैज्ञानिक प्रोफेसर अनिंद्य सिन्हा हैं ।
15 जनवरी 2009 को निमोनिया और सेप्टीसीमिया से उनकी मृत्यु हो गई।

🎥फिल्में

ज़िन्दगी ज़िन्दगी
सफेद हाथी (1977 फ़िल्म)
तपन सिन्हा की कुछ फ़िल्में ये रहीं:
Daughters of This Century (2001)
इस सदी की बेटियाँ (2001)
Wheel Chair (1995)
व्हील चेयर (1995)
Antardhaan (1991)
अंतर्धान (1991)
Ek Doctor Ki Maut (1990)
एक डॉक्टर की मौत (1990)
Aaj Ka Robin Hood (1987)
आज का रॉबिन हुड (1987)
Adalat O Ekti Meye (1982)
अदालत ओ एकती मेये (1982)
Safed Haathi (1977)
सफ़ेद हाथी (1977)
Sagina (1974)
सागीना (1974)
Zindagi Zindagi (1972)
जिंदगी जिंदगी (1972)
Aadmi Aur Aurat (1984) 
आदमी और औरत (1984) 
 
तपन सिन्हा ने हिन्दी और बंगाली दोनों सिनेमा में काम किया. उनकी फ़िल्में भारत के अलावा, बर्लिन, वेनिस, लंदन, मास्को जैसे अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में भी दिखाई गईं. 
पेशाःनिर्देशक पटकथा निर्माता लेखक संगीत

जन्मः2 अक्टूबर, 1924
जन्मस्थानःकोलकाता, पश्चिम बंगाल, भारत

प्रेमीःतपन सिन्हा सत्यजीत रे, मृणाल सेन औरऋत्विक घटक के साथ सबसे प्रमुख बंगाली फिल्म निर्माताओं में से एक थे। उनका एक लंबा और शानदार करियर था जो लगभग छह दशक लंबा था। उन्हें 2006 में भारत में सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।अरुंधति देवी प्रारंभिक जीवन
तपन का जन्म 2 अक्टूबर, 1924 को कोलकाता, पश्चिम बंगाल में हुआ था और उन्होंने भागलपुर से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की और बाद में कलकत्ता विश्वविद्यालय से एमएससी की उपाधि प्राप्त की।

निजी जीवन 

तपन सिन्हा ने अभिनेत्री अरुंधति देवी से विवाह किया और 1990 में उनकी मृत्यु तक वे साथ रहे। उनके विवाह से उन्हें अनिंद्य सिन्हा नाम का एक बेटा है, जो एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक है।
तपन निमोनिया और सेप्टीसीमिया से पीड़ित थे और 15 जनवरी, 2009 को उनका निधन हो गया । इसके बाद वे फिल्म निर्माण सीखने के लिए इंग्लैंड चले गए और दो साल तक पाइनवुड स्टूडियो में साउंड इंजीनियर के रूप में काम किया। टेल ऑफ़ टू सिटीज़ (1935) के सिनेमाई रूपांतरण ने उन्हें फिल्म निर्माण में आने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपने करियर में 40 से अधिक फिल्मों का निर्देशन किया और उनमें से कई के लिए उन्हें आलोचनात्मक प्रशंसा मिली। अंकश (1954)उनकी पहली फिल्म थी और इसमें मुख्य किरदार एक हाथी था। उनकी अगली फिल्म उपहार (1955) में बंगाली स्टार उत्तम कुमार थे, लेकिन 1957 में ही तपन सिन्हा को फिल्म काबुलीवाला के लिए पहला पुरस्कार मिला। रवींद्रनाथ टैगोर की लघु कहानी पर आधारित इस फिल्म ने उस वर्ष सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। हेमेन गुप्ता ने इसे हिंदी में भी बनाया था। उनकी अगली फिल्म लौह कपाट (1957) ने भी वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता झिन्दर बंदी (1961) तपन की सबसे व्यावसायिक रूप से सफल फिल्मों में से एक थी। इसमें उत्तम कुमार और सौमित्र चटर्जी ने पहली बार एक साथ काम किया था। यह लेखक शरदिंदु बंद्योपाध्याय की एक कहानी पर आधारित थी । 1960 के दशक के उत्तरार्ध में तपन की कई फ़िल्में जैसे अतिथि, हाटे बाज़ारे और अपंजन को बहुत सराहा गया और उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले। एकहानी एक और फ़िल्म थी जिसने सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। सगीना महतो भी उनकी प्रमुख फ़िल्मों में से एक थी जिसमें दिलीप कुमार और सायरा बानो मुख्य भूमिका में थे। यह 1942-43 के मज़दूर आंदोलन की सच्ची कहानी पर आधारित थी। उनकी गोलपो होलो सत्यी को बाद में बावर्ची में रीमेक किया गया।
ऋषिकेश मुखर्जी । तपन ने कुछ हिंदी फ़िल्मों का निर्देशन भी किया। हालाँकि उनकी पहली हिंदी फ़िल्म ज़िंदगी ज़िंदगी कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाई, लेकिन उनकी सफ़ेद हाथी को काफ़ी सराहना मिली और उसे सर्वश्रेष्ठ बाल फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इसके बाद उन्होंने आदमी और औरत और दीदी जैसी कुछ हिंदी टेलीफ़िल्में बनाईं। हालाँकि, उनकी सबसे प्रशंसित हिंदी फ़िल्म पंकज कपूर अभिनीत एक डॉक्टर की मौत (1991) रही। रामपद चौधरी की कहानी पर आधारित इस फ़िल्म में एक डॉक्टर कुष्ठ रोग के लिए एक टीका बनाता
है, लेकिन इसके लिए उसे पूरे डॉक्टर समुदाय द्वारा बहिष्कृत कर दिया जाता है। इस फ़िल्म के लिए तपन को सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार और साथ ही दूसरा सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म का पुरस्कार मिला। इसके बाद
उन्होंने कुछ वृत्तचित्रों पर काम किया, जिनमें से एक वैज्ञानिक जगदीश बोस पर आधारित था।उन्होंने 5 भाग की फ़ीचर फ़िल्म डॉटर ऑफ़ दिस सेंचुरी का भी निर्देशन किया, जिसमें दिखाया गया कि कैसे एक सदी में महिलाओं के प्रति नज़रिया नहीं बदला है।तपन की अंतिम फ़िल्म अनोखा मोती अधूरी रह गई।

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